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Tuesday, 29 March 2016

मैनेजमेंट करती हैं पब्लिशर्स से सेटिंग, प्रिंसिपल लगाता है मोहर, गुमराह होते हैं पेरेंट्स

** शहर में 60% स्कूल प्राइवेट, किसी किसी से टाईअप 
अम्बाला सिटी : शहर में करीब 60 प्रतिशत प्राइवेट स्कूल हैं और तकरीबन स्कूलों का टाईअप किसी किसी पब्लिशर्स से हो रखा है। यह खेल पर्दे के पीछे रहकर मैनेजमेंट खेलती है और इस पर उसी स्कूल का प्रिंसिपल मोहर लगाता है। फिर दोनों मिलकर अभिभावकों को गुमराह करते हैं। ऐसे में अगर कोई पेरेंट्स स्कूल के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसके बच्चे को स्कूल से रेस्टीकेट करने का डर दिखाकर चुप करा दिया जाता है। कुछ ऐसा ही खेल चल रहा है अम्बाला के प्राइवेट स्कूलों में। जिसे अधिकारी जानते तो हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर डरते हैं। 
सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) के नियमों को ताक पर रखकर स्कूल अपने कैंपस में ही किताबों सेल कर देते हैं। पेरेंट्स को इतनी भी छूट नहीं दी जाती कि वह बच्चे का स्कूल बैग बाहर से खरीद सके। यह सब इसलिए किया जाता है, क्योंकि किताबों की दुकान के विक्रेताओं की भी कमीशन किताबों में होती है और अगर स्कूल खुद यह बेचते हैं तो उन्हें वह कमीशन नहीं देनी पड़ती और पूरा प्रॉफिट स्कूल को ही मिलता है। 
फीसमें ही जोड़ ली जाती है रकम: 
स्कूलोंमें मंथली फीस ली जाती है। इसमें किताब, नोटबुक, स्टेशनरी स्कूल यूनिफॉर्म के पैसे जोड़ दिए जाते हैं। स्कूल फीस हर महीने बैंक में जमा होती है और स्टूडेंट्स से कहा जाता है कि बाहर से कुछ भी खरीदने की जरूरत नहीं। साल में दो बार गर्मियों सर्दियों की यूनिफॉर्म दी जाती है। इसकी रकम भी फीस में पहले से ही जोड़ दी जाती है। 
"सभी स्कूलों को प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें सेल करने के लिए मना किया है। एनसीईआरटी की ही किताबें सेल होंगी। क्योंकि इसके लिए हाइकोर्ट भी सख्त आदेश जारी कर चुकी है। अगर काेई स्कूल ऐसा करेगा तो उस पर सख्ती से कार्रवाई की जाएगी।"-- जिलेसिंह अत्री, डीईओ अम्बाला। 
प्रिंसिपल को मिलते हैं गिफ्ट 
निसा के प्रधान कुलभूषण शर्मा ने बताया कि मैनेजमेंट और पब्लिशर्स के बीच सेटिंग होने के बाद स्कूल प्रिंसिपल का रोल आता है। बिना प्रिंसिपल की मोहर के यह ठेका कागजों में पब्लिशर्स उठा नहीं सकता और मैनेजमेंट अलॉट नहीं कर सकती। इसके लिए प्रिंसिपल की स्वीकृति जरूरी होती है। हालांकि ज्यादातर प्रिंसिपल इससे बचते हैं, लेकिन मैनेजमेंट के दबाव के आगे कुछ नहीं बोल पाते। लिहाजा, उन्हें चुप कराने के लिए प्रिंसिपल को लुभावने तोहफे दिए जाते हैं, जिनकी कीमत हजारों-लाखों में होती है। प्रिंसिपल भी कागजों पर मोहर लगाकर इस खेल का हिस्सेदार बन जाता है। 
इस तरह सेट होती है कमीशन 
शहरके तकरीबन स्कूलों की मैनेजमेंट कमीशन के खेल को सेट करती है। वैसे तो एकेडमिक सेशन की शुरुआत के साथ पब्लिशर्स ही स्कूल मैनेजमेंट के पास सेटिंग करने पहुंच जाते हैं। अगर वह आने में देर लगा देते हैं तो मैनेजमेंट अपने चहेतों को बुलाकर सेटिंग करने में जुट जाती है। इसके बाद ठेका देने के पीछे कमीशन का खेल सेट होता है, जोकि लाखों में जाता है। पब्लिशर्स जितना ज्यादा कमीशन देता है, मैनेजमेंट उसको ठेका अलार्ट कर देती है।                                                    db

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