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Monday, 9 February 2026

CBSE : अब दादा-दादी भी बनेंगे स्कूल का हिस्सा, स्क्रीन की लत पर लगेगी लगाम

** सीबीएसई ने स्कूलों को बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के बीच भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाने के लिए दादा-दादी/नाना-नानी को गतिविधियों में शामिल करने का निर्देश दिया है। इसका उद्देश्य बच्चों को मोबाइल की लत से दूर करना और पारिवारिक मूल्यों को बढ़ावा देना है। 

** स्कूलों को राष्ट्रीय पर्वों और 'ग्रैंडपैरेंट्स वाकथान' जैसे कार्यक्रम आयोजित करने को कहा गया है, जिससे बच्चों में बुजुर्गों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता बढ़ेगी, साथ ही बुजुर्गों को भी अकेलापन दूर करने में मदद मिलेगी।


नई दिल्ली : केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने एक अनोखी पहल करते हुए देशभर के सभी संबद्ध स्कूलों को निर्देश जारी किए हैं कि वे बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के बीच भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करने के लिए दादा-दादी और नाना-नानी को स्कूली गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल करें।

यह कदम न केवल पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करेगा, बल्कि बच्चों को मोबाइल और डिजिटल उपकरणों की बढ़ती लत से भी दूर करने में मददगार साबित होगा।

बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि स्वतंत्रता दिवस, बाल दिवस, गणतंत्र दिवस और विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस (एक अक्टूबर) जैसे राष्ट्रीय और सामाजिक महत्व के अवसरों पर बच्चों के दादा-दादी व नाना-नानी को स्कूल में आमंत्रित किया जाए।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से न केवल बच्चों में पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि उनमें बुजुर्गों के प्रति सम्मान, संवेदनशीलता और अपनेपन की भावना भी विकसित होगी।

मोबाइल की लत से छुटकारा 

आजकल अधिकांश बच्चे मोबाइल फोन, टैबलेट और वीडियो गेम्स में इतने व्यस्त रहते हैं कि वे परिवार के सदस्यों, खासकर बुजुर्गों से दूर होते जा रहे हैं।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि स्क्रीन टाइम की बढ़ती लत बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही है। सीबीएसई की यह पहल इस समस्या का एक प्राकृतिक समाधान है।

जब बच्चे दादा-दादी के साथ समय बिताएंगे, उनकी कहानियां सुनेंगे, पारंपरिक खेल खेलेंगे और उनसे जीवन के अनुभव सीखेंगे, तो वे स्वाभाविक रूप से मोबाइल से दूर होंगे।

ग्रैंडपैरेंट्स वाकथान जैसे विशेष कार्यक्रम होंगे आयोजित 

सीबीएसई ने स्कूलों को ग्रैंडपैरेंट्स वाकथान जैसे विशेष कार्यक्रम आयोजित करने की सलाह दी है, जिसमें दादा-दादी और नाना-नानी अपने पोते-पोतियों के साथ मिलकर टहल सकें। यह गतिविधि न केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होगी, बल्कि इससे पीढ़ियों के बीच संवाद और आपसी समझ भी बढ़ेगी।

इसके अलावा, स्कूल विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम, कहानी सुनाने के सत्र, पारंपरिक खेल प्रतियोगिताएं, कला-शिल्प की कार्यशालाओं और रसोई से जुड़ी गतिविधियों में भी बुजुर्गों को शामिल कर सकते हैं। ये सभी गतिविधियां बच्चों को स्क्रीन से दूर रखते हुए उन्हें वास्तविक दुनिया से जोड़ेंगी।

बोर्ड ने स्कूलों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सभी कार्यक्रम सम्मानजनक तरीके से आयोजित किए जाएं और किसी भी तरह का भेदभाव न हो। बुजुर्गों की शारीरिक सीमाओं और विशेष आवश्यकताओं का पूरा ध्यान रखा जाए।

दो पीढ़ियों को मिलेगा फायदा -

बच्चों के लिए:

  • मोबाइल और डिजिटल उपकरणों की लत में कमी
  • पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों की शिक्षा
  • बुजुर्गों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता
  • जीवन के व्यावहारिक अनुभवों से सीखने का मौका
  • सामाजिक और भावनात्मक विकास

बुजुर्गों के लिए:

  • अकेलेपन और अवसाद से मुक्ति
  • समाज से जुड़े रहने का अवसर
  • अपनी उपयोगिता का एहसास
  • मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य में सुधार
  • पोते-पोतियों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय

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