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Saturday, 6 December 2014

स्कूलों का सच : 2 कमरों में 5 कक्षाएं, इंटर्न के हवाले पढ़ाई

महेंद्रगढ़ : हरियाणा के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की शुरुआत की तस्वीर ही बदरंग है। बुनियादी शिक्षा के लिए गांव-गांव प्राइमरी स्कूल तो बनाए गए हैं लेकिन बस नाम के। न पर्याप्त कमरे और न स्टाफ। ऐसे में बहुत मजबूरी में ही लोग अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजते हैं। लिहाजा विद्यार्थियों की संख्या भी बहुत कम है। प्रदेश के शिक्षा मंत्री प्रो. रामबिलास शर्मा के गृह जिले महेंद्रगढ़ में ही हाल बुरा है। पूरे प्रदेश में भी हालात बहुत खराब हैं।
महेंद्रगढ़ के आदलपुर गांव की प्राइमरी पाठशाला में टॉयलेट की दीवार के नीचे दबने से पांचवीं कक्षा के विद्यार्थी धर्मेंद्र की मौत के कारणों को जानने के लिए जब टीम यहां पहुंची तो बुनियादी शिक्षा की सच्चाई सामने आई। जहां यह हादसा हुआ उस स्कूल में केवल 37 विद्यार्थी हैं। पहली कक्षा में 7, दूसरी में 11, तीसरी में 7, चौथी में 5 और पांचवीं में 9 विद्यार्थियों का नाम स्कूल में दर्ज है। इनमें से भी आधे गैर हाजिर रहते हैं।
स्कूल में बच्चों के बैठने के लिए तीन कमरे हैं। एक कमरा चौकीदार के आराम के लिए है, जिसमें दो चारपाई डली हुई हैं। इसी कमरे में और कबाड़ भी पड़ा हुआ है। स्कूल में जब पहुंचे तो वहां दिल्ली की दिशा और पाली गांव की विपिन पढ़ा रही थीं। पढ़ने वाले थे मात्र पांच बच्चे। पढ़ाने वाली ये दोनों लड़कियां शिक्षक नहीं, बल्कि जेबीटी पढ़ाई के दौरान इंटर्नशिप के लिये यहां आई हुई थीं। जब दिशा से धर्मेंद्र के बारे में पूछा गया तो उसने बताया कि वह पढ़ाई में अच्छा था। खेलों एवं पेंटिंग में भी खासी रुचि लेता था।
खरकड़ा गांव के स्कूल में
स्कूल के मुख्य अध्यापक अत्तर सिंह करीब डेढ़ दर्जन बच्चों को लाइन में लगाकर गांव की ओर भेज रहे थे। उन्होंने बताया कि गांव में एक व्यक्ति के यहां लंच है और कई बार आग्रह के बाद उन्होंने बच्चों को दोपहर भोज को भेजा है। अत्तर सिंह के सहयोग के लिए यहां एक जेबीटी शिक्षक भी है। स्कूल में पहली से पांचवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों की संख्या 41 है। इनमें 19 लडक़े और 22 लड़कियां शामिल हैं।
अरावली पर्वत शृंखला से ही सटे खुड़ाना गांव की सीता सिंह की ढाणी में बनी प्राथमिक पाठशाला में जब पहुंचे तो वहां केवल 6-7 ही बच्चे मिले।
स्कूल के मुखिया राजेंद्र व जेबीटी शिक्षक राजेश मलिक ने बताया कि अभी तफरी हुई है, इसलिए बच्चे नहीं हैं। विद्यार्थियों के लिए इस स्कूल में भी केवल दो ही कमरे हैं। एक छोटा सा रसोईघर बना हुआ है, जिसमें बच्चों के लिए मिड-डे मिल तैयार होता है। यहां के टॉयलेट की स्थिति बेहतर दिखी। स्कूल के आसपास का माहौल भी ज्यादा अच्छा नहीं है।                                                                          dt

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